पाकिस्तान की राजनीति में एक सवाल हमेशा से उठा है: वहां वास्तव में कौन शासन करता है? शहबाज शरीफ, प्रधानमंत्री के दफ्तर में तो चिट्ठियां आती-जाती हैं, लेकिन फाइलें खोलने का काम कौन करता है? हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट्स और विश्लेषण इसी 'परदे के पीछे' की कहानी को उजागर कर रहे हैं। फरवरी 2024 के विवादित चुनावों के बाद बनाई गई यह सरकार केवल एक गठबंधन नहीं, बल्कि सैनिक और नागरिक ताकतों के बीच एक नाजुक समझौते का परिणाम है।
यहाँ बात सिर्फ नामों की नहीं, बल्कि संरचनाओं की है। जब आप पाकिस्तान की राजनीति को देखते हैं, तो आपको तीन मुख्य स्तंभ दिखाई देते हैं: नागरिक सरकार, राष्ट्रपति पद, और सबसे महत्वपूर्ण—सेना।
नाममात्र सरकार या वास्तविक सत्ता?
पाकिस्तान मूस्लिम لیگ (नवाज) के नेता शहबाज शरीफ ने 11 अप्रैल 2022 से प्रधानमंत्री का पद संभाला था, लेकिन फरवरी 2024 के चुनावों के बाद उनकी स्थिति और भी जटिल हो गई। वीडियो विश्लेषकों के अनुसार, शहबाज को 'विपक्षी गठबंधन' द्वारा चुना गया था, जिसका मुख्य कारण उनका संबंध उनके भाई नवाज शरीफ से था। नवाज शरीफ, जिन्होंने 1997 से 1999 तक तीन बार प्रधानमंत्री का पद संभाला था, पंजाब में अपनी पार्टी के लिए एक मजबूत राजनीतिक आधार रखते हैं।
लेकिन यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति रुक जाती है और सैनिक हस्तक्षेप शुरू होता है। आसिफ अली जरदारी, राष्ट्रपति, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पति हैं, ने 2024 में दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभाला। हालाँकि, सार्वजनिक रूप से वे रਾज्य के प्रमुख हैं, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि निर्णय लेने की शक्ति कहीं और केंद्रित है।
जनरल आसिम मुनीर: परदे के पीछे का हाथ?
अब आते हैं उस सवाल पर जो हर मुहाफिज के मन में है: "पाकिस्तान की असली सत्ता किसके हाथ में है?" उत्तर स्पष्ट रूप से जनरल आसिम मुनीर, चिफ ऑफ आर्मी स्टाफ की ओर इशारा करता है। पूर्व आईएसआई (Inter-Services Intelligence) चीफ के रूप में अपनी सेवाएं निभा चुके मुनीर को अब न केवल सेना का प्रमुख, बल्कि देश की राजनीति, विदेश नीति और न्यायपालिका को नियंत्रित करने वाला व्यक्ति माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि मुनीर का प्रभाव इतना गहरा है कि वे सीधे तौर पर नीतियों को आकार देते हैं। पहलगाम हमले जैसे घटनाक्रमों के संदर्भ में, कुछ सुरक्षा विशेषज्ञ मुनीर को जिम्मेदार ठहराते हैं, क्योंकि हमले से ठीक पहले उन्होंने दिए गए कुछ बयानों को भड़काऊ बताया गया था। यह दर्शाता है कि सेना की भूमिका अब केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रही है, बल्कि वह राजनीतिक दिशा-निर्धारण में भी सक्रिय है।
प्रशासनिक पुनर्गठन: क्यों बांटें प्रांत?
राजनीतिक लड़ाई के बीच, सरकार एक नए कदम की तैयारी में है। मंत्री अब्दुल अलीम खान ने घोषणा की है कि जल्द ही नए छोटे प्रांत बनाए जाएंगे। उनका तर्क है कि इससे प्रशासन बेहतर होगा। लेकिन, बिलावल भुट्टो, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेहरे हैं और वर्तमान सरकार के सहयोगी भी, ने सबसे पहले इस योजना पर सवाल उठाए।
बिलावल का सुझाव है कि सबसे पहले पंजाब को बांटा जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि पंजाब को नवाज शरीफ परिवार का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। क्या यह कदम वास्तव में प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए है, या फिर सेना द्वारा बढ़ते विद्रोह और अलगाववादी आंदोलनों को रोकने की एक रणनीति है? यह सवाल अभी भी खुला है।
आतंकवाद और 'ऑपरेशन सिंडूर' का प्रभाव
सुरक्षा माहौल भी तनावपूर्ण बना हुआ है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 'ऑपरेशन सिंडूर' के बाद पाकिस्तान में आतंकियों में खौफ का माहौल है। लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर और पहलगाम हमले के मास्टरमाइंड माने जाने वाले सैफुल्लाह कसूरी ने हाल ही में खुलेआम धमकी दी है। एक कार्यक्रम में, जहां सैफुल्लाह के साथ पाकिस्तान के पंजाब असेंबली के स्पीकर मोहम्मद अहमद खान और हाफिज सईद के बेटे टालहा सईद भी मौजूद थे, सैफुल्लाह ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जान से मारने की धमकी दी।
यह दृश्य यह संकेत देता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीति के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं है। जब आतंकी नेता सरकारी अधिकारियों के साथ एक ही मंच साझा करते हैं, तो यह सवाल उठता है कि राज्य की नीतियां कहाँ खत्म होती हैं और आतंकवाद की शुरूआत कहाँ से होती है।
Frequently Asked Questions
पाकिस्तान में वास्तव में कौन सत्ता संभाले हुए है?
भले ही शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री और आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति हों, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जनरल आसिम मुनीर और सेना की हाई 커मांड देश की वास्तविक नीतियों, विशेष रूप से विदेश नीति और सुरक्षा मामलों में, निर्णायक भूमिका निभा रही है।
पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने का क्या उद्देश्य है?
सरकार का दावा है कि इससे प्रशासन बेहतर होगा। हालांकि, बिलावल भुट्टो जैसे नेता इसे नवाज शरीफ परिवार की पकड़ कम करने और सेना द्वारा बढ़ते विद्रोह को रोकने की एक रणनीति मानते हैं।
सैफुल्लाह कसूरी और मोहम्मद अहमद खान का संबंध क्या है?
हाल ही में एक कार्यक्रम में सैफुल्लाह कसूरी (लश्कर-ए-तैयबा कमांडर) और पंजाब असेंबली के स्पीकर मोहम्मद अहमद खान एक ही मंच पर दिखाई दिए। यह दृश्य यह संकेत देता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद और राजनीति के बीच गहरे संबंध हैं।
फरवरी 2024 के चुनावों के बाद सरकार कैसे बनी?
फरवरी 2024 के विवादित चुनावों के बाद, विपक्षी गठबंधन ने शहबाज शरीफ को अपना नेता चुना। यह सरकार नागरिक और सैनिक ताकतों के बीच एक समझौते का परिणाम थी, जिसमें आसिफ अली जरदारी को राष्ट्रपति बनाया गया।